हिंदी फिल्मों के प्रति दर्शकों का नजरिया क्यों बदल रहा है, जानिए Suparn Verma से।

क्या हिंदी फिल्में अब सिर्फ ‘सेफ’ कहानियों का नाम बनकर रह गई हैं?
सोचिए, अगर आज कोई ‘Lokesh Kanagaraj’ स्टाइल की फिल्म हिंदी में बनाए, तो क्या हम उसे वैसे ही गले लगाएंगे जैसे हम डब की हुई फिल्मों को लगाते हैं? शायद नहीं।
Suparn Verma, जिन्होंने हाल ही में एक पैनल डिस्कशन में अपनी बात रखी, उनका मानना है कि हिंदी सिनेमा के दर्शक अब बहुत ज्यादा ‘unforgiving’ यानी सख्त हो गए हैं।
हाल ही में एक Zoom राउंडटेबल में Suparn Verma, Neeraj Ghaywan, Anurag Basu, Arati Kadav और Reema Kagti के साथ बैठे थे। वहां चर्चा छिड़ी आज की फिल्मों, हिंसा के चित्रण और आर्टिस्टिक फ्रीडम पर।
हिंदी ऑडियंस इतनी सख्त क्यों है?
Suparn Verma ने एक बहुत पते की बात कही। उन्होंने कहा कि अक्सर जब हम किसी आइडिया पर चर्चा करते हैं, तो अचानक महसूस होता है कि “अरे, यह तो तेलुगु या मलयालम फिल्म के तौर पर तो हिट हो जाएगी, लेकिन हिंदी में इसे कोई नहीं पूछेगा।”
यह एक कड़वा सच है। हिंदी दर्शक अब अपनी ही फिल्मों को लेकर बहुत ज्यादा जजमेंटल हो गए हैं। जो छूट हम डब फिल्मों को देते हैं, वही ‘लार्जर देन लाइफ’ सिनेमा अगर बॉलीवुड बनाने की कोशिश करे, तो उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया जाता है।
सिनेमाघरों का खाली होना
आजकल थिएटर्स खाली जा रहे हैं। Suparn Verma इस बात से ज्यादा परेशान नहीं हैं कि फिल्में फ्लॉप हो रही हैं, बल्कि वो फिल्ममेकर्स के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनके मुताबिक:
- हम फिल्में उन लोगों के लिए बना ही नहीं रहे हैं जो उन्हें देखना चाहते हैं, क्योंकि वो इसे afford नहीं कर सकते।
- एक मिडिल क्लास परिवार के लिए थिएटर जाना अब एक महंगा सौदा बन गया है।
- लगभग 80% से 85% भारत अब सिनेमाघरों में फिल्में नहीं देख रहा है। वे सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का इंतजार करते हैं।
The Deep Dive: क्यों मर रहा है मास सिनेमा?
अक्सर लोग सोचते हैं कि ओटीटी आने से फिल्में खत्म हो रही हैं। लेकिन Suparn Verma का तर्क अलग है। समस्या बजट और पहुंच की है।
जब एक औसत परिवार की कमाई कम हो और टिकट के दाम आसमान छू रहे हों, तो सिनेमा ‘मास’ का नहीं, ‘क्लास’ का खेल बनकर रह जाता है।
हम केवल उस 15-20% आबादी के लिए कंटेंट बना रहे हैं जो मल्टीप्लेक्स के पॉपकॉर्न खरीद सकती है।
Counter-Intuitive Advice: जो हम अक्सर गलत समझते हैं
आमतौर पर लोग कहते हैं कि फिल्ममेकर्स को पूरी आजादी होनी चाहिए। लेकिन इस चर्चा में ‘आजादी के साथ जिम्मेदारी’ पर जोर दिया गया।
Suparn Verma का मानना है कि दर्शकों की बदलती पसंद का मतलब यह नहीं है कि हम एक्सपेरिमेंट करना बंद कर दें, बल्कि हमें यह समझना होगा कि दर्शक अब पहले से ज्यादा स्मार्ट और जागरूक हैं। उन्हें आप पुराना फॉर्मूला नए पैकेज में नहीं बेच सकते।
कौन हैं Suparn Verma और आगे क्या?
अगर आप सोच रहे हैं कि यह राय देने वाले शख्स ने खुद क्या किया है, तो बता दें कि Suparn Verma ने The Family Man के तीसरे सीजन में अपनी छाप छोड़ी है।
उन्होंने Yami Gautam स्टारर Haq को डायरेक्ट किया और Lootere जैसी थ्रिलर लिखी। 2023 में The Trial और Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai जैसे सफल प्रोजेक्ट्स के बाद, अब वो Qurbani के रीमेक और 2025 में आने वाली फिल्म Flames की तैयारी में जुटे हैं।
सिनेमा बदल रहा है, और शायद अब समय आ गया है कि हम अपनी कहानियों को सिर्फ ‘ग्लैमर’ के लिए नहीं, बल्कि उस ‘85% भारत’ के लिए भी बनाएं जो आज भी एक अच्छी कहानी का इंतजार कर रहा है।

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